जनपद जौनपुर के गांव भदेठी का एक ऐसा परिवार जिसने कई पीढ़ी से असहाय, गरीबों मज़लूमों की मदद करता आया है। निर्धन वर्ग के लोगों को छत दी, उनकी बेटियों की शादी करायी, उनके बच्चों के पढ़ने लिखने की ज़िम्मेदारी उठाई। यह कोई कहानी नहीं बल्कि अगर आप जौनपुर से नहीं है तो कोई मित्र, रिश्तेदार परिचित हो तो पूछ लीजिएगा जावेद सिद्दीकी के परिवार के बारे में।

जामिया से पढ़ाई पूरी करने के बाद सिंगापुर न जाकर गांव वापस आकर समाज सेवा करने का ग़लत फैसला लिया था आपने।

मिला क्या? कई गंभीर धाराओं के साथ रासुका और गैंगस्टर लगाकर जेल में डाल दिया गया।

जी हाँ, जावेद सिद्दीकी जिन्हें अभी दो महीने पहले उन्हीं के गांव भदेठी में एक छोटे से झगड़े को राजनीतिक षणयंत्र के तहत साम्प्रदायिक रंग देकर उसका मास्टर माइंड बना दिया गया।

9 जून की रात को आम तोड़ने को लेकर दलित और गांव के मुस्लिम पक्ष के बीच में कहा सुनी से बिगड़ता हुआ मामला मार पीट तक जा पहुंचा। गांव में तो इस तरह का झगड़ा आये दिन हुआ करता है, लेकिन उस दिन गांव भदेठी की मनहूस रात थी क्योंकि राजनीतिक गिद्दों की नज़र उसपर पड़ गयी थी। फिर क्या था, एक छोटा सा दो पक्षों का झगड़े को साम्प्रदायिक हिंसा का नाम दे दिया गया।

घटना की जानकारी पुकिस को होती है तो एकतरफा कार्यवाही करते हुए मुस्लिम समुदाय के 36 लोगों को रात में गिरफ्तार कर लिया जाता है,  जिसमें जावेद के साथ कई निर्दोष लोगों को भी पुलिस गिरफ्तार कर ले जाती है। वजह, जावेद की लोकप्रियता सत्ताधारी नेताओं की खटक रही थी, और यह एक अच्छा मौका था जावेद को फंसाने के लिए। बस फिर क्या था, आजकल तो बस उर्दू नाम वाला कोई चाहिए, रासुका हो, गैंगस्टर हो सब थोक भाव में लाद दिया जाएगा, वही जावेद के साथ भी हुआ।

वहीं दलित समुदाय ने ही  बयान दिया है कि घटना में जावेद सिद्दीकी के अलावा कुछ और लोग निर्दोष हैं क्योंकि उक्त घटना में उनकी कोई संलिप्तता नहीं है। ये लोग घटना के समय अपने घर थे। फिर, इन्हें क्यों फंसाया जा रहा है?

जिस गांव में जावेद सिद्दीकी को गरीबों का मसीहा कहा जाता था उसी गांव के एक झगड़ा (जिसे दंगा बताकर) उसका  मास्टरमाइंड बना दिया गया। जिसमें उनकी कोई संलिप्तता ही नहीं थी,  वहीं दलित समुदाय के कितने परिवार को दुःख है कि जिसने उनकी बरसों से मदद की उसे ही फंसा दिया गया।

यह सब कुछ राजनीतिक षणयंत्र का हिस्सा रहा। उनको फंसाने के लिए यह सब प्रीप्लांड था।

उसी गांव में जावेद सिद्दीक़ी के दादा ने एक पुल का निर्माण करवाया था, और समाज सेवा की उस खानदानी विरासत को आगे बढ़ाते हुए जावेद ने भी दूसरा पुल अपने निजी पैसों से गांव के लोगों को बनवाकर दिया। जब गांव के लोगों को आने जाने में बड़ी दुश्वारी होती थी तो ग्रामीणों ने कई विधायक सांसदों के दरवाजे खटखटाये, लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ न हुआ तो फिर ये जिम्मा उठाया जावेद ने जिसपर इंडिया टूडे ने एक स्टोरी भी की थी जिसको मैंने नीचे संलग्नक किया।

अपने पुरखों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए   जावेद पिछले दस बरस से समाज सेवा करते आ रहे हैं, जामिया से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें सिंगापुर भेजा जा रहा था ताकि जाकर अपना फैमिली बिजनेस संभाले। वहां उनका बड़े पैमाने पर फैमिली बिजनेस हैं। सिंगापुर के लिटिल इंडिया नामक जगह पर उनका मुस्तफा शॉपिंग मॉल है और हांकांग मलेशिया जैसे कई अन्य देशों में उनका बिजनेस फैला हुआ है।

लेकिन Javed Siddiqui को वहां जाना मंज़ूर नहीं था, उन्होंने परिवार की बात न मानते हुए वापस गांव लौंटने का फैसला लिया और जुट गए समाज सेवा में।

लेकिन हुआ क्या?

जो इंसान कभी किसी से तेज़ आवाज़ में बात तक नहीं कर सकता, उसे गांव में हुई हिंसा का मास्टरमाइंड बना दिया गया।

जिस इंसान ने गांव के निर्धन वर्ग के लोगों को घर बनवाकर दिया उसे उसी के गांव के दलित समाज के लोगों का घर जलाने का इल्जाम उसपर लगा दिया गया।

जिसपर 151 तक का मुकदमा नहीं है, उसपर 19 गंभीर धाराओं के साथ गैंगस्टर और रासुका लगाकर सलाखों के पीछे डाल दिया गया।

आज जावेद का जन्मदिन है, पिछले दो महीने से वो जेल में हैं। एक बेहद शरीफ और नेकदिल इंसान जिसकी अच्छाइयों और उसके सरल स्वभाव के बारे में जौनपुर में कौन नहीं जानता।

उन्हें निर्दोष साबित होने में अब काफी वक्त लगेगा, कब वो बाहर आएंगे कुछ नहीं पता।

आज यकीनन, जावेद जेल की चार दीवारों के बीच यह ज़रूर सोचते होंगे कि काश कि जामिया से पढ़ाई पूरी करने के बाद वो सिंगापुर चले गए होते।

वो कहते हैं न कि किसी अच्छाई और की नेकी कभी मरती नहीं, ज़रूर उसके एवज में अच्छा ही होगा। सच्चाई की ही जीत होती है भले देर से ही सही।

जन्मदिन पर हम सबकी दुआ है मेरे भाई, तुम अपने निर्दोष होने की लड़ाई ज़रूर जीतोगे।

Report By Sartaj Khan

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