17 जुलाई 1980 को दूसरे SLV-3 के प्रक्षेपण से 30 घंटे पहले सारे अख़बार तमाम तरह की भविष्यवाणी से भरे थे। एक अख़बार ने लिखा-” परियोजना निदेशक का कुछ पता नहीं चल रहा है। उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है”

। कुछ लोग पुराने मिशन की असफलताओं पर लिख रहे थे कि कैसे ईंधन की कमी के चलते तीसरे चरण  के इंजन ने काम करना बंद कर दिया था और रॉकेट समुद्र में जा गिरा था। कुछ अख़बारों ने ऐसे पुर्वानुमान लगाए जो देश को कष्ट देने वाले थे। मुझे मालूम था कि अगले दिन का प्रक्षेपण देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम का भविष्य तय करने जा रहा है। या तो अब या फिर कभी नहीं। वास्तव में पूरे देश की निगाहें हम पर लगी थीं।

 

अगले दिन 18 जुलाई 1980 को 8 बजकर 30 मिनट पर श्रीहरिकोटा रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से SLV-3 ने उड़ान भरी। 600 सौवें सेकंड पर मैंने देखा कि रोहिणी उपग्रह को कक्षा में प्रवेश कराने के लिए चौथे चरण के इंजन से मिलने वाले जरूरी वेग के बारे में कम्प्यूटर पर आंकड़े आ रहे हैं। अगले दो मिनट में रोहिणी उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हो गया।

 

मैंने कर्कश आवाज़ में जो महत्वपूर्ण शब्द उस समय चिल्लाते हुए कहे, शायद ही जीवन में कभी कहा होगा-“मिशन डायरेक्टर की सभी स्टेशनों को सूचना। महत्वपूर्ण घोषणा के लिए तैयार रहें। सभी चरणों ने मिशन की ज़रूरतों को पूरी कर ली है। चौथे चरण के इंजन ने रोहिणी उपग्रह को स्थापित करने के लिए ज़रूरी वेग दे दिया है।” हर जगह लोग खुशी से चिल्ला उठे।

 

जैसे ही मैं ब्लॉक से बाहर आया मेरे साथियों ने मुझे कंधे पर उठा लिया और मेरा जुलूस निकाला। सारा देश खुशी से रोमांचित था। भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया, जिनके पास उपग्रह प्रक्षेपण की क्षमता थी। यह राष्ट्र के एक सपने के साथ ही देश के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरूआत थी। संसद में मेजें थपथपाकर बधाई दी गई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने फोनकर बधाई दी। मैं बहुत खुश था। लेकिन मैं दुखी भी था कि मेरी खुशी बांटने वाले अब दुनिया में नहीं थे- मेरे पिता, मेरे बहनोई और प्रोफेसर साराभाई

 

भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की किताब “अग्नि की उड़ान” से लिया गया एक हिस्सा।

 

देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम साहब की आज 27 जुलाई पुण्यतिथि पर खिराज़ ए अक़ीदत 💐

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